
काठमांडू, नेपाल — एक बार फिर नेपाल में राजशाही की वापसी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। दशकों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत संचालित हो रहा यह हिमालयी राष्ट्र आज फिर उसी चौराहे पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहाँ जनता और राजनीतिक वर्ग के बीच विश्वास की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों में बढ़ते विरोध-प्रदर्शन, राजावादी रैलियों और सोशल मीडिया पर तेज होती मुहिम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या नेपाल फिर से राजशाही की ओर लौटने जा रहा है?
✅ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
नेपाल में 2008 तक एक संवैधानिक राजतंत्र था। देश में दो शताब्दियों से ज्यादा समय तक शाह वंश का शासन रहा। लेकिन राजा ज्ञानेन्द्र की एकतरफा सत्ता पर कब्जे और फिर जनता आंदोलन—जनआंदोलन-II (2006)—के बाद नेपाल ने खुद को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। राजतंत्र को समाप्त कर दिया गया और राजा को नारायणहिटी महल छोड़कर सामान्य नागरिक की तरह रहना पड़ा।
लेकिन आज, लगभग 17 साल बाद, जब देश बेरोजगारी, महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार से जूझ रहा है, तब जनता के एक बड़े हिस्से में फिर से राजशाही के प्रति आकर्षण देखा जा रहा है।
📢 जनता की आवाज़: “राजा आऊँ, देश बचाऊँ”
हाल ही में काठमांडू, पोखरा, बिराटनगर और नेपालगंज जैसे शहरों में हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर नारे लगाए—”राजा आऊँ, देश बचाऊँ।” ये नारे न केवल एक भावनात्मक अपील हैं, बल्कि देश के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के प्रति गहरी नाराज़गी का संकेत भी हैं। खासकर युवाओं में यह भावना तेजी से बढ़ रही है।
राजावादी संगठनों जैसे राष्ट्रवादी नागरिक समाज और नेपाल राजशाही समर्थक मोर्चा द्वारा आयोजित रैलियों में लोगों की बढ़ती भागीदारी यह दर्शाती है कि राजशाही की वापसी अब केवल विचारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक आंदोलन का रूप ले रहा है।
🧑⚖️ राजनीतिक प्रतिक्रियाएं:
नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दल जैसे नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और माओवादी केंद्र राजशाही की वापसी की संभावना को सिरे से नकार रहे हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं और राजतंत्र की बहाली देश को पीछे ले जाएगी।
हालाँकि, पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह के कुछ बयानों ने इस बहस को और गर्म कर दिया है। उन्होंने हाल ही में एक सार्वजनिक समारोह में कहा,
“देश जिस दिशा में जा रहा है, वहाँ एकता, स्थिरता और नैतिक नेतृत्व की ज़रूरत है।”
यह बयान राजनीतिक गलियारों में राजशाही की वापसी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
📊 जनमत सर्वेक्षण क्या कहता है?
हाल ही में एक स्थानीय थिंक टैंक नेपाल पॉलिसी रिसर्च फाउंडेशन द्वारा किए गए जनमत सर्वेक्षण में यह सामने आया कि लगभग 42% लोग मानते हैं कि राजशाही की वापसी से देश में स्थिरता आ सकती है। वहीं, 50% लोग लोकतंत्र को बनाए रखने के पक्ष में हैं, लेकिन उनमें से भी आधे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से असंतुष्ट हैं।
इसका मतलब है कि जबकि राजशाही के प्रति भावनात्मक झुकाव बढ़ रहा है, परंतु यह मत पूरी तरह एकतरफा नहीं है।
💰 राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट:
नेपाल की अर्थव्यवस्था कोविड-19 महामारी और फिर रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते बुरी तरह प्रभावित हुई है। विदेशी निवेश में गिरावट, पर्यटन उद्योग का ठहराव और बढ़ती बेरोजगारी ने सरकार की लोकप्रियता को बुरी तरह गिरा दिया है।
इसी असंतोष की पृष्ठभूमि में राजशाही को एक विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है—जो कम से कम “स्थिर शासन” तो दे सकता है।
🌐 सोशल मीडिया पर राजशाही ट्रेंड में
ट्विटर (अब X), फेसबुक और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर #BringBackTheKing, #RajaAaunuparcha और #MonarchyForNepal जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई युवा कंटेंट क्रिएटर्स खुलेआम राजशाही की वकालत कर रहे हैं और राजतंत्र के “गौरवशाली” अतीत को सामने रख रहे हैं।
कुछ वीडियोज़ में तो यह दावा भी किया गया है कि जब राजा शासन करते थे, तब “भ्रष्टाचार नहीं था, देश सुरक्षित था, और विदेशों में नेपाली पासपोर्ट की इज्जत होती थी।”
📜 संवैधानिक पहलू:
नेपाल का मौजूदा संविधान राजशाही की किसी भी तरह की वापसी की अनुमति नहीं देता। अगर किसी प्रकार से राजशाही की बहाली की जानी हो, तो इसके लिए संविधान में संशोधन करना होगा, जो संसद में दो-तिहाई बहुमत के बिना संभव नहीं है।
फिलहाल, किसी भी बड़े दल ने खुलकर संविधान संशोधन की मांग नहीं की है। लेकिन अगर जन आंदोलन तेज होता है, तो यह बहस संसद के भीतर भी दस्तक दे सकती है।
🧠 विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. रघु राम श्रेष्ठ का कहना है:
“राजशाही की वापसी की मांग जनता की निराशा का प्रतीक है। यह जरूरी नहीं कि लोग वास्तव में राजा को सत्ता में देखना चाहते हैं, बल्कि वे मौजूदा व्यवस्था से इतने थक चुके हैं कि पुराने शासन की ओर लौटना उन्हें आसान रास्ता लगता है।”
वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा नेता मन्जु अधिकारी का मानना है:
“समस्या व्यवस्था में नहीं, उसके संचालन में है। अगर लोकतंत्र को सही ढंग से चलाया जाए, तो किसी राजतंत्र की आवश्यकता नहीं होती।”
🔮 भविष्य की राह: क्या होगा आगे?
फिलहाल, नेपाल में राजशाही की वापसी एक ज्वलंत राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। यह साफ है कि जनभावनाएं तेजी से बदल रही हैं और जनता वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश में है। हालाँकि, संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनमत का सही मूल्यांकन ही तय करेगा कि नेपाल फिर से राजशाही की ओर बढ़ेगा या लोकतंत्र में सुधार के रास्ते पर आगे बढ़ेगा।
🔚 निष्कर्ष:
नेपाल एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है—जहाँ लोकतंत्र की स्थिरता और राजशाही की लोकप्रियता आमने-सामने हैं। यह समय है जब राजनीतिक दलों को आत्मचिंतन कर जनता के विश्वास को पुनः प्राप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, वरना “राजा आऊँ, देश बचाऊँ” सिर्फ नारा नहीं, हकीकत बन सकता है।