अफगानिस्तान–पाकिस्तान सीमा पर हालात एक बार फिर विस्फोटक हो गए हैं। डूरंड लाइन के संवेदनशील इलाकों में तालिबान लड़ाकों ने पाकिस्तान की दो और सैन्य चौकियों पर कब्जा करने का दावा किया है। इस घटनाक्रम के बाद सीमा पर संघर्ष तेज हो गया है और दोनों ओर से भारी गोलाबारी की खबरें सामने आ रही हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, पिछले 48 घंटों में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है।
डूरंड लाइन, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लगभग 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा है, लंबे समय से विवाद का विषय रही है। अफगानिस्तान की कई सरकारों ने इस सीमा को औपनिवेशिक काल की विरासत बताते हुए आधिकारिक मान्यता देने से परहेज किया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद से भी इस मुद्दे पर तनाव कम नहीं हुआ, बल्कि कई स्थानों पर झड़पें और बढ़ गई हैं।
दो पोस्ट पर कब्जे का दावा
तालिबान से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सीमा के पहाड़ी इलाके में स्थित दो पाकिस्तानी सैन्य चौकियों को घेरकर उन पर कब्जा कर लिया गया है। उनका दावा है कि ये चौकियां हाल ही में पाकिस्तान द्वारा बनाई गई थीं और अफगान क्षेत्र में अतिक्रमण कर रही थीं। तालिबान के प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा कि “हम अपनी संप्रभुता की रक्षा कर रहे हैं और किसी भी तरह के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
हालांकि पाकिस्तान की ओर से इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने केवल इतना कहा है कि “सीमा पर कुछ स्थानों पर झड़पें हुई हैं और स्थिति नियंत्रण में है।” मगर स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स में दोनों ओर से हताहतों की आशंका जताई जा रही है।
सीमा पर तेज गोलाबारी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, देर रात से शुरू हुई गोलीबारी सुबह तक जारी रही। मोर्टार और भारी हथियारों के इस्तेमाल की भी खबरें हैं। सीमा के नजदीकी गांवों के लोग सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्कूल और बाजार बंद कर दिए गए हैं तथा प्रशासन ने एहतियातन सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष केवल सीमाई विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक और राजनीतिक कारण भी हैं। पाकिस्तान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि अफगानिस्तान की धरती से सक्रिय आतंकी संगठन उसके खिलाफ हमले कर रहे हैं। वहीं तालिबान प्रशासन का कहना है कि वह अपनी जमीन किसी भी देश के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देगा।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
डूरंड लाइन का निर्धारण 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगान अमीर के बीच हुआ था। अफगानिस्तान में इसे आज भी विवादित माना जाता है। इस सीमा के दोनों ओर पश्तून आबादी रहती है, जिसके कारण सांस्कृतिक और पारिवारिक रिश्ते भी गहरे हैं। इसी वजह से सीमा पर तारबंदी और चौकियों के निर्माण को लेकर समय-समय पर विवाद भड़कते रहे हैं।
जब से तालिबान ने 2021 में काबुल पर कब्जा कर सत्ता संभाली, तब से पाकिस्तान के साथ उसके रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। शुरुआत में दोनों देशों के बीच सहयोग की उम्मीद जताई गई थी, लेकिन सीमा सुरक्षा और आतंकी गतिविधियों के आरोपों ने रिश्तों में खटास ला दी।
क्षेत्रीय प्रभाव
सीमा पर बढ़ते तनाव का असर पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो शरणार्थियों की नई लहर पैदा हो सकती है और क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है। पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संगठनों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। हालांकि अब तक किसी बड़े देश की ओर से औपचारिक मध्यस्थता की पेशकश सामने नहीं आई है।
आगे क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों देशों के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के बीच जल्द बातचीत नहीं हुई तो हालात और बिगड़ सकते हैं। सीमा पर लगातार हो रही झड़पें किसी बड़े सैन्य टकराव का रूप ले सकती हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि दोनों पक्ष व्यापक युद्ध नहीं चाहते और अंततः कूटनीतिक रास्ता ही अपनाया जाएगा।
फिलहाल डूरंड लाइन पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। दोनों ओर अतिरिक्त बलों की तैनाती की जा रही है और निगरानी बढ़ा दी गई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह संघर्ष सीमित झड़पों तक सिमटता है या फिर बड़े टकराव में बदलता है।
निष्कर्ष
डूरंड लाइन पर दो और पोस्ट कब्जाने के तालिबान के दावे ने अफगानिस्तान–पाकिस्तान संबंधों में नई दरार डाल दी है। सीमा पर जारी गोलाबारी और बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय शांति पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि दोनों देश इस संकट से कैसे निपटते हैं—संवाद के जरिए या संघर्ष के रास्ते।