लेह, लद्दाख — भारत के दूर-दराज़ हिमालयी क्षेत्र लद्दाख में हाल के दिनों में हुए प्रदर्शन ने तूल पकड़ लिया है। नागरिक, विशेष रूप से युवा, लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के द्वारा स्वायत्त अधिकार देने की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन पिछले कुछ हफ्तों से चल रहा था, लेकिन हाल ही में हिंसा और सरकारी कार्रवाई के चलते यह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है।
प्रदर्शन की शुरुआत और कारण
लद्दाख को 2019 में जम्मू‑कश्मीर से अलग करते समय अनुच्छेद 370 हटाया गया व वह एक संघशासित प्रदेश (Union Territory) बना। इस बदलाव के बाद वहां को कोई विधानसभा नहीं दी गई, यानी स्थानीय जनता को कानून बनाने, भूमि नीति तय करने और संसाधन प्रबंधन में सीमित अधिकार ही मिले।
व्यापक आक्रोश इस बात से जुड़ा है कि, बिना स्थानीय स्वायत्तता के, केंद्र सरकार द्वारा लिए गए विकास और निवेश निर्णय स्थानीय संवेदनशीलता, पारिस्थितिकी और जातीय-सांस्कृतिक पहचान को अनदेखा कर सकते हैं। इसके अलावा, लोगों को डर है कि बाहर से आने वाले लोग भूमि खरीद लेंगे और स्थानीय लोगों की नौकरियों की संभावनाएँ प्रभावित होंगी।
इन सब मांगों के बीच, लोगों ने छठी अनुसूची (Sixth Schedule) का प्रावधान लागू करने की मांग की है, जिससे आदिवासी इलाकों को विधानसभा, प्रशासनिक नियंत्रण और न्यायिक आत्मनिर्णय का अधिकार मिल सके।
प्रदर्शन की अगुआई कर रहे पर्यावरण-समाज कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कई दिनों तक भूख हड़ताल भी रखी थी, ताकि केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से संवाद करने को बाध्य किया जा सके।

हिंसा और तनाव: कब, कहाँ और कैसे?
अक्टूबर 24/09/2025 को लद्दाख की राजधानी लेह में प्रदर्शन हिंसक संघर्ष में बदल गया। प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी कार्यालय और एक पुलिस वाहन में आग लगाने की घटना की। वहीं पुलिस ने कैमिकल गैस, लाठी-चार्ज और फायरिंग का सहारा लिया।
सरकार ने सेक्शन १६३ (BNS 2023) लागू कर दी, जिसके अंतर्गत पाँच या अधिक लोगों के एकत्र होने, रैली, प्रदर्शन आदि पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
स्थानीय सूत्रों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस हिंसा में कम से कम चार लोगों की मौत हुई, जबकि दर्जनों लोग घायल हुए हैं। इसके अलावा पुलिस और सुरक्षाकर्मी भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
अधिकारियों का कहना है कि पुलिस को मजबूरन स्व-सुरक्षा में फायरिंग करनी पड़ी, लेकिन ऐसी घटनाएं जहां नागरिकों की जान चली जाए, बहुत निंदनीय और चिंताजनक मानी जाती हैं।
स्थानीय प्रशासन ने पूरे इलाके में कर्फ्यू लगा दिया और जनसभा और सार्वजनिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी।
नेताओं की प्रतिक्रिया और आंदोलन का पहलू
प्रदर्शन की अगुआई कर रहे थुपस्टान ट्सवांग (Leh Apex Body के अध्यक्ष) ने कहा:
“हमारे आंदोलन के लिए हमारे कई युवा शहीद हो गए हैं। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके बलिदान व्यर्थ न जाए।”
दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि सोनम वांगचुक की “उत्तेजक भाषणों” ने हालात बिगाड़े। गृह मंत्रालय का यह दावा है कि पुलिस को सार्वजनिक शांति बनाए रखनी पड़ी।
हालाँकि, सरकार ने यह भी माना कि लद्दाख के स्थानीय हितों को लेकर शिकायतें अस्तित्व में हैं, और लद्दाख Apex Body और Kargil Democratic Alliance के साथ बातचीत की पहल की गई है।
लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह देर-सवेर की प्रतिक्रिया है, और वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी वादों की लिस्ट को आवाज मिल गई है। कुछ राजनेताओं ने सरकार पर हमला बोला है कि वह लद्दाख के लोगों को “राजनीतिक इनकार” की स्थिति में रख रही है।
आंदोलन की चुनौतियाँ और सवाल
- संवाद की प्रक्रिया – सरकार एवं स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच चर्चा कितनी पारदर्शी होगी?
- हिंसा बनाम अहिंसा – आंदोलन की सीमाएं तय करना ज़रूरी है; कहीं आंदोलन को राजनीतिक दुष्प्रचार का शिकार न बनाया जाए।
- संवैधानिक बाधाएँ – छठी अनुसूची का विस्तार करना आसान नहीं है; संसदीय प्रक्रियाएँ जटिल हैं।
- भू–राजनीति और सुरक्षा – लद्दाख चीन और पाकिस्तान की सीमाओं से सटा है; अतः केंद्र सरकार की सुरक्षा चिंताएँ अलग हैं।
- तटस्थ मीडिया व निष्पक्ष कवरेज – संविधानिक और संवेदनशील मुद्दों पर मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
लद्दाख में यह आंदोलन सिर्फ “राज्य‑दर्जा” की मांग नहीं है; यह जन-आक्रोश है कि कैसे सीमित अधिकारों और संवैधानिक उपेक्षा के बीच एक क्षेत्र अपनी आवाज उठाता है।
हिंसा और संघर्ष से दूर, सरकार और आंदोलनकारियों को मिलकर रास्ता निकालना होगा, जो न्याय, सुरक्षा, सम्मान और विकास को एक संतुलन में रखे।