बरेली | 1 अक्टूबर 2025
उत्तर प्रदेश के बरेली में ‘I Love Muhammad’ पोस्टर को लेकर फैली हिंसा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक भावनाओं के नाम पर नफरत का कारोबार कब तक चलता रहेगा? जो लोग मोहब्बत के नाम पर सड़कों पर उतरते हैं, क्या उन्हें अपने ही प्रदेश का इतिहास नहीं याद?
30 सितंबर को बरेली में जुमे की नमाज के बाद हिंसा भड़क गई। ‘I Love Muhammad’ नामक अभियान के तहत लगाए गए बैनरों और पोस्टरों को लेकर दो पक्ष आमने-सामने आ गए। नतीजा—पत्थरबाज़ी, आगजनी, तोड़फोड़ और भारी पुलिस बल की तैनाती। प्रशासन के मुताबिक, स्थिति अब नियंत्रण में है, लेकिन बरेली अब सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक सवाल बन चुका है — क्या हम कुछ सीखेंगे?
‘I Love Muhammad’ — या ‘I Hate Harmony’?
शुरुआत में यह अभियान एक धार्मिक प्रेम का प्रदर्शन बताया गया। लेकिन जैसे-जैसे यह अभियान सोशल मीडिया और शहरों की गलियों में पसरने लगा, इसके पीछे छिपा एजेंडा भी सामने आने लगा। स्थानीय पुलिस ने साफ किया कि कई जगहों पर यह अभियान बिना अनुमति चलाया गया, और जानबूझकर ऐसी जगहों को चुना गया जहां साम्प्रदायिक संतुलन नाजुक था।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘I Love Muhammad’ जैसे नारों का इस्तेमाल केवल भावनात्मक उकसावे के लिए किया जा रहा है। यह कोई संयोग नहीं कि इस अभियान के तहत सबसे पहले ऐसे शहर चुने गए जहां पहले भी सांप्रदायिक तनाव रह चुका है। इससे पहले संभल और बलरामपुर में भी इसी तरह की घटनाएं हुई थीं, लेकिन वहां प्रशासन ने समय रहते हालात संभाल लिए। सवाल यह है कि बरेली में वैसा क्यों नहीं हुआ?

तौकीर राजा और सियासी चुप्पी
इस पूरे मामले में सबसे विवादास्पद नाम उभर कर आया है — तौकीर रज़ा खान का। ऑल इंडिया इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के अध्यक्ष और बरेलवी नेता तौकीर रज़ा ने पहले इस अभियान का समर्थन किया और फिर हिंसा के बाद चुप्पी साध ली। यह वही तौकीर रज़ा हैं जिन्होंने इससे पहले कई बार भड़काऊ बयान दिए हैं।
क्या यह चुप्पी मौन समर्थन है या स्थिति की गंभीरता को लेकर डर? यह अभी साफ नहीं, लेकिन इतना जरूर साफ है कि जब नेता धर्म के नाम पर सड़क पर उतरते हैं, तो आम जनता ही कुचली जाती है।
बलरामपुर और संभल को क्यों याद किया जाए?
लेखक चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने हालिया एक लेख में लिखा — “अगर बलरामपुर और संभल की मिसालें याद रखी जातीं, तो बरेली न जलता।” बलरामपुर में कुछ महीने पहले एक धार्मिक झांकी के दौरान ऐसा ही तनाव पैदा हुआ था, लेकिन वहां प्रशासन की सतर्कता और दोनों समुदायों की पहल से मामला सुलझ गया। इसी तरह संभल में उकसावे के बावजूद लोगों ने संयम बरता और शांति बहाल रखी।
इन उदाहरणों से साफ है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नागरिक सजगता मिल जाए तो नफरत फैलाने वालों को मात दी जा सकती है।
योगी सरकार की सख्ती या सियासी रणनीति?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिंसा के तुरंत बाद कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए। NSA के तहत गिरफ़्तारियाँ हुईं, सोशल मीडिया निगरानी बढ़ाई गई और कई जिलों में धारा 144 लागू कर दी गई। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन घटनाओं को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है।
कांग्रेस और सपा नेताओं ने कहा कि राज्य सरकार केवल एक समुदाय को टारगेट कर रही है और असली गुनहगार खुले घूम रहे हैं। वहीं बीजेपी का कहना है कि “नफरत फैलाने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा, चाहे वे किसी भी धर्म से हों।”
सोशल मीडिया — चिंगारी या आग?
इस घटना में सोशल मीडिया की भूमिका भी जांच के घेरे में है। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर फैलाए गए पोस्टों से तनाव भड़का। कई अकाउंट्स विदेश से ऑपरेट हो रहे थे, जिनका मकसद सिर्फ धार्मिक उकसावा था। साइबर सेल ने ऐसे 47 अकाउंट्स की पहचान की है, जिनमें से कुछ पाकिस्तानी नेटवर्क से जुड़े पाए गए हैं।
अंतिम सवाल — कब समझेगा भारत?
‘I Love Muhammad’ एक धार्मिक प्रेम का नारा हो सकता है, लेकिन जब यह नफरत की जमीन पर बोया जाए, तो उसका फल हिंसा ही होता है। बरेली इसका ताज़ा उदाहरण है। हमें यह तय करना होगा कि क्या हम वाकई मोहब्बत को समझते हैं, या सिर्फ नारे लगाना जानते हैं?
बलरामपुर और संभल की तरह अगर समाज और प्रशासन साथ खड़े हों, तो कोई नफरत नहीं जीत सकती। लेकिन अगर हम चुप रहेंगे, तो हर शहर कभी न कभी बरेली बन जाएगा।
इस रिपोर्ट का उद्देश्य किसी समुदाय विशेष को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करना है।