2025 में सूर्यग्रहण की दो बड़ी घटनाएँ हुईं। पहला ग्रहण 29 मार्च को हुआ, जो कि साल का पहला सूर्यग्रहण था। दूसरा ग्रहण 21‑22 सितंबर की रात को लगने वाला है। ये घटनाएँ न केवल खगोलीय दृष्टि से, बल्कि धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
29 मार्च 2025 का पहला सूर्यग्रहण — मुख्य तथ्य
- यह आंशिक सूर्यग्रहण (partial solar eclipse) था, जहाँ चंद्रमा सूर्य के कुछ हिस्से को ढकता है, लेकिन पूरी तरह नहीं।
- भारत समयानुसार यह ग्रहण दोपहर 2:21 बजे से शुरू होकर शाम 6:14 बजे तक रहा, कुल अवधि लगभग 3 घंटे 53 मिनट की।
- हालांकि समय भारत के लिए निर्धारित था, लेकिन इस ग्रहण का दृश्य भारत से दिखाई नहीं पड़ा। उसका मार्ग भारत से होकर नहीं गया।
सूतक काल (Sutak Kaal) का नियम
“सूतक काल” ग्रहण से पूर्व का एक धार्मिक समय माना जाता है, जब कुछ पवित्र/असूचित कार्यों पर बंदिशें लगती हैं, पूजा‑पाठ, भोजन आदि से संबंधित नियम प्राकृतिक और धार्मिक परंपराओं के अनुसार लागू होते हैं।
- 29 मार्च के ग्रहण के मामले में, चूँकि यह ग्रहण भारत में नहीं दिखा, इसलिए सूतक काल भारत में मान्य नहीं होगा।
- धार्मिक दृष्टिकोण से, यदि ग्रहण भारत में दिखाई न दे, तो सूतक काल लागू न करना या ऋतुशुद्ध कार्य जारी रखना आम प्रथा है।

21‑22 सितंबर 2025 का ग्रहण: समय और अपेक्षित प्रभाव
- इस ग्रहण का आरंभ भारतीय समयानुसार 21 सितंबर की रात 10:59 बजे होगा। यह 22 सितंबर की सुबह 3:23 बजे समाप्त होगा, लगभग 4 घंटे 24 मिनट की अवधि के साथ।
- यह खंडग्रास ग्रहण (partial eclipse) होगा।
- भारत से यह ग्रहण दिखाई नहीं देगा क्योंकि यह रात में होगा और भारत पर आकाश में ग्रहण की छाया नहीं पहुंचेगी।
- इसी कारण सूतक काल इस ग्रहण के लिए भी भारत में लागू नहीं होगा।
धार्मिक, ज्योतिषीय और सांस्कृतिक दृष्टिकोण
ग्रहण भारतीय धार्मिक विश्वासों में प्राचीन काल से महत्वपूर्ण रहे हैं। शास्त्रों तथा पुराणों में ग्रहण के दौरान की जाने वाली मान्यताएँ, उपवास, मंत्र जाप, मंदिरों आदि की स्थिति के नियम आदि वर्णित हैं।
- ग्रहण के समय खाना‑पीना, विशेषकर बाहर का खाना, तैयार भोजन, मेवे आदि से सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
- गर्भवती महिलाओं को विशेष एहतियात बरतने की सलाह होती है — अंधेरे, प्रकाश परिवर्तन या अन्य असमय स्थितियों से बचने के लिए।
- ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान, जल का उपयोग और देवी‑देवताओं की पूजा आदि धार्मिक शुद्धता की पुनर्स्थापना के तौर पर किए जाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ग्रहण की समझ
विज्ञान बताता है कि सूर्यग्रहण तब होता है जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य एक सीर pline में आ जाते हैं, और चंद्रमा सूर्य की रोशनी को आंशिक या पूर्ण रूप से अवरुद्ध कर देता है।
- आंशिक ग्रहण होने पर सूर्य का कुछ हिस्सा तो दिखाई देता है और कुछ हिस्सा अंधेरे में छिप जाता है। पूरी तरह का ग्रहण (पूर्ण ग्रहण) rare होता है और सिर्फ कुछ विशेष स्थानों से ही दिखता है।
- वैज्ञानिकों की चेतावनी होती है कि बिना उपयुक्त सुरक्षा उपायों के सीधे सूर्य की ओर देखने से आँखों को गहरा नुकसान हो सकता है। विशेष “solar eclipse glasses” या अन्य सुरक्षित फिल्टर इस्तेमाल करना ज़रूरी है।
समाज और व्यक्तिगत प्रभाव
भले ही ग्रहण भारत से दिखाई न दे, लेकिन इसके धार्मिक और ज्योतिषीय प्रभाव और चर्चाएँ बनी हुई हैं। लोग ग्रहण के दिन कुछ विशेष उपाय करते हैं, जैसे:
- मंत्रों का जाप करना, सूर्य बीज मन्त्र, गायत्री मन्त्र आदि।
- इस प्रकार के दिन परिवर्तन, आंतरिक शांति, आत्मचिंतन की इच्छा बढ़ जाती है। ग्रहण को जीवन में बदलाव और नए आरंभ के दृष्टिकोण से देखा जाता है।
- धार्मिक समारोहों एवं सामाजिक कार्यालयों में ग्रहण को ध्यान में रखकर तिथियों का चयन किया जाता है, विवाह‑समारोह, शुभ कार्य आदि।