
वाशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान आव्रजन नीतियों में कई कड़े और निर्णायक बदलाव देखने को मिले हैं। इसी क्रम में अब ट्रंप प्रशासन ने एक और बड़ा फैसला लेते हुए H-1B वीजा प्रक्रिया में अहम बदलावों की घोषणा की है। इस नए नियम के तहत न केवल वीजा आवेदन की प्रक्रिया को पहले से कहीं अधिक सख्त और जटिल बना दिया गया है, बल्कि आवेदन फीस में भी बड़ा इज़ाफा किया गया है। इसका सीधा असर भारत जैसे देशों के लाखों पेशेवरों और IT कंपनियों पर पड़ने वाला है, जो हर साल बड़ी संख्या में H-1B वीजा के लिए आवेदन करते हैं।
क्या है H-1B वीजा?
H-1B वीजा एक गैर-प्रवासी वीजा होता है, जो अमेरिकी कंपनियों को विदेशी पेशेवरों को खास तकनीकी क्षेत्रों में काम पर रखने की अनुमति देता है। खास तौर पर इंजीनियरिंग, आईटी, विज्ञान, और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में कुशल कामगारों को अमेरिका में काम करने का अवसर इस वीजा के माध्यम से मिलता है। भारत इस वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी देश रहा है।
क्या हैं नए बदलाव?
ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा प्रक्रिया में जो बदलाव किए हैं, वे निम्नलिखित हैं:
- आवेदन फीस में वृद्धि:
अब H-1B वीजा के लिए आवेदन करने वाले नियोक्ताओं को पहले से ज्यादा फीस चुकानी होगी।
- पहले H-1B वीजा आवेदन फीस $460 थी।
- अब इसे बढ़ाकर $555 कर दिया गया है।
- इसके अलावा, कुछ कंपनियों को अतिरिक्त शुल्क भी देना होगा, यदि वे एक विशेष संख्या से अधिक विदेशी कामगारों को नियुक्त करती हैं।
- प्राथमिकता आधारित चयन प्रणाली:
नई चयन प्रणाली में अब उन आवेदनों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनकी वेतन संरचना अधिक है। इसका मतलब यह है कि उच्च वेतन देने वाले नियोक्ताओं के उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिलेगी। इससे छोटे व्यवसायों और स्टार्टअप्स के लिए H-1B वीजा पाना मुश्किल हो सकता है।
- अस्थायी वीजा की अवधि पर नियंत्रण:
नए नियमों के तहत H-1B वीजा की अवधि और उसके नवीनीकरण को लेकर भी सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। पहले यह वीजा अधिकतम 6 साल के लिए होता था (3 साल + 3 साल का विस्तार), लेकिन अब ट्रंप प्रशासन इसे केस-बाय-केस आधार पर ही बढ़ाएगा।
- संभावित वीजा निरस्तीकरण की प्रक्रिया तेज:
अगर किसी वीजा धारक या उसके नियोक्ता ने नियमों का उल्लंघन किया, तो अब वीजा रद्द करने की प्रक्रिया अधिक तेज़ी से पूरी की जाएगी।
ट्रंप का उद्देश्य क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप की “America First” नीति के तहत यह बदलाव किया गया है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि H-1B वीजा प्रणाली का वर्षों से दुरुपयोग हो रहा था और इससे अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों पर असर पड़ा है। ट्रंप का मानना है कि अमेरिकी कंपनियों को पहले अमेरिकी नागरिकों को नौकरी पर रखना चाहिए और विदेशी कामगारों पर उनकी निर्भरता कम होनी चाहिए।
उनका यह भी कहना है कि H-1B वीजा का उद्देश्य विशिष्ट और अत्यधिक कुशल पेशेवरों को मौका देना था, लेकिन इसका उपयोग अब “सस्ते श्रमिकों” को लाने के लिए किया जा रहा है, जिससे अमेरिकी कामगारों की वेतन वृद्धि रुक गई है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत H-1B वीजा धारकों में सबसे आगे है। हर साल कुल H-1B वीजा का करीब 70% भारतीय पेशेवरों को जाता है। आईटी क्षेत्र की प्रमुख भारतीय कंपनियां — जैसे कि TCS, Infosys, Wipro, HCL — बड़ी संख्या में H-1B वीजा पर अपने कर्मचारियों को अमेरिका भेजती हैं।
नए नियमों के बाद इन कंपनियों को:
- ज्यादा फीस चुकानी होगी,
- उच्च वेतन देना पड़ेगा,
- और वीजा की अनिश्चितता के कारण बिज़नेस रणनीतियों में बदलाव करने पड़ सकते हैं।
इसके अलावा, बहुत सारे युवा भारतीय जो अमेरिका में करियर बनाने का सपना देखते हैं, उनके लिए भी ये नियम एक बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
विशेषज्ञों की राय
आव्रजन मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि ये बदलाव तकनीकी क्षेत्र की ग्रोथ पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। अमेरिका में बड़ी टेक कंपनियां जैसे Google, Facebook, Microsoft पहले ही कह चुकी हैं कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय टैलेंट की जरूरत होती है, और H-1B वीजा इसमें अहम भूमिका निभाता है।
सिलिकॉन वैली के निवेशक और उद्योगपति भी इन बदलावों को अमेरिका की प्रतिस्पर्धा क्षमता के खिलाफ बता रहे हैं। उनका तर्क है कि तकनीकी नवाचार के लिए वैश्विक प्रतिभा का होना ज़रूरी है और इन नीतियों से अमेरिका में टैलेंट की कमी हो सकती है।
राजनीतिक पहलू
यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। ट्रंप अपनी चुनावी रणनीति में आव्रजन के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं। इससे उनके रूढ़िवादी समर्थकों को यह संकेत मिलता है कि ट्रंप अमेरिकी मूल्यों और कामगारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।
वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी इस फैसले की आलोचना कर रही है और इसे अमेरिकी टेक्नोलॉजी क्षेत्र के लिए “घातक” बता रही है।